क्यों हुआ था लखनऊ समझौता, इतिहासकारों ने मानी थी भूल

Last Updated: Jun 22, 2026, 17:34 IST

इतिहास के पन्नों में हमें लखनऊ समझौता के बारे में पढ़ने को मिलता है। यह वह समझौता है, जिसका संबंध 1947 के भारत के बंटवारे से माना जाता है। इस लेख में हम लखनऊ समझौता के बारे में विस्तार से जानेंगे।

लखनऊ समझौता
लखनऊ समझौता

भारत के इतिहास में कई बड़े समझौते हुए, जिसमें से एक लखनऊ समझौता भी शामिल है। यह वह समझौता है, जिसका संबंध 1947 में भारत के बंटवारे से माना जाता है। 

दरअसल, यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का एक बड़ा समझौता रहा है, जो कि दिसंबर, 1916 में लखनऊ में हुआ था। इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का एक संयुक्त अधिवेशन हुआ था, जहां दोनों दलों ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

किसने करवाया था लखनऊ समझौता 

लखनऊ समझौता को करवाने में कांग्रेस से बाल गंगाधर तिलक और कांग्रेस व मुस्लिम लीग पार्टी से सदस्य मुहम्मद अली जिन्ना ने मुख्य भूमिका निभाई थी। जिन्ना के इस प्रयास की वजह से सरोजिनी नायडू ने उन्हें 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' भी कहा था।

क्या थी समझौते की पृष्ठभूमि

1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी। वह कांग्रेस के विरोध में थी। हालांकि, 1911 में बंगाल विभाजन के रद्द होने की वजह से लीग का एक बड़ा धड़ा अंग्रेजों से नाराज हो गया था। इसके बाद ब्रिटेन द्वारा तुर्की पर हमला करने के बाद लीग में नाराजगी बढ़ गई थी। ऐसे समय में कांग्रेस के भीतर नरम दल और गरम दल का भी पुनर्मिलन हुआ।

समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे

लखनऊ समझौते के तहत दोनों दलों ने ब्रिटिश सरकार के सामने संवैधानिक सुधारों की मांग की थी, जो कि इस प्रकार हैः

-दलों ने मांग की थी युद्ध के बाद भारत को स्वशासन का दर्जा दिया जाना चाहिए।

-कांग्रेस ने पहली बार मुस्लिम लीग की पृथक निर्वाचन व्यवस्था को मान लिया था।

-केंद्रीय व्यवस्था में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने पर सहमति हुई थी।

-यदि किसी सदन में किसी धर्म से जुड़ा कोई प्रस्ताव लाया जाता है और उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करते हैं, तो वह प्रस्ताव पास नहीं होगा।

क्या था समझौते का महत्त्व

इस समझौते ने देश में हिंदु-मुस्लिम सहयोग की एक नई मिसाल पेश की। इसकी नींव के आधार पर आगे चलकर 1920 का असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन चले थे। वहीं, ब्रिटिश सरकार पर भी दोनों दला का दबाव बना, जिससे 1917 में मोंटेग्यू घोषणा हुई, जिसमें भविष्य में भारतीयों को शासन में शामिल करने का वादा किया गया था।

यह रहा नकारात्मक पहलू

इतिहासकारों ने लखनऊ समझौते को कांग्रेस की एक बड़ी भूल माना था। उनका मानना था कि पृथक निर्वाचक वाली मांग को मानकर कांग्रेस ने अनजाने में यह मान लिया कि भारत के हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राजनीतिक समुदाय हैं। इस समझौते ने  'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) को जन्म दिया, जिससे 1947 में भारत का विभाजन हुआ।

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jun 22, 2026, 17:34 IST

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