भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें विभिन्न युद्ध देखने को मिलते हैं। इस कड़ी में कई ऐसे युद्ध हुए हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। ऐसे में क्या आप भारत में एक ऐसे युद्ध के बारे में जानते हैं, जिसे वर्चस्व का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध ने भारत में मुगलों की नींव को और मजबूत करने का काम किया था। कौन-सा था वह युद्ध, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
कब हुआ था खानवा का युद्ध
खानवा का युद्ध 17 मार्च, 1527 में खानवा नाम के गांव में लड़ा गया था। यह आगरा से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह युद्ध मुगल सम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर और मेवाड़ के राजा राणा सांगा के बीच हुआ था।
क्यों लड़ा गया था खानवा का युद्ध
बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराकर आगरा में कब्जा कर लिया था। वहीं, दूसरी तरफ, राणा सांगा उत्तर भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे। ऐसे में दोनों शासकों के बीच आगरा के पास खानवा का युद्ध हुआ था। इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी बाबर से हारने के बाद राणा सांगा की शरण में चला गया था। ऐसे में सांगा ने बाबर के खिलाफ लड़ने के लिए एक बड़ा मोर्चा तैयार किया था।
कैसे हुई बाबर की जीत
बाबर ने पानीपत के युद्ध की तरह खानवा के युद्ध में भी तुलुगुमा युद्ध तकनीक का उपयोग किया था। साथ ही, बड़ी संख्या में तोपखाने का भी उपयोग किया गया था। इस वजह से राणा सांगा की सेना आधुनिक युद्ध पद्धति का सामना नहीं कर पाई। वहीं, युद्ध में राणा सांगा घायल हो गए थे, जिसके बाद उन्हें युद्ध स्थल से दूर ले जाया गया। कुशल नेतृत्व न होने के कारण सांगा की सेना कमजोर हो गई, जिससे बाबर की जीत हुई थी।
बाबर ने धारण की यह उपाधि
इस युद्ध में हारने के बाद बाबर द्वारा ‘गाजी’ की उपाधि धारण की गई थी। गाजी का अर्थ है कि काफिरों को मारने वाला योद्धा।
दिल्ली-आगरा पर काबिज हुआ शासन
खानवा के युद्ध के बाद बाबर का दिल्ली-आगरा पर मजबूत शासन हो गया था। इस युद्ध से यह तय हो गया था कि अब भारत में मुगलों की सत्ता और मजबूत हो गई है। हालांकि, इसके बाद भी राजपूतों और मुगलों में कई बार युद्ध हुए।
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