भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें यहां विभिन्न राजाओं का शासन देखने को मिलता है। प्राचीन भारत में ऐसे कई राजा हुए हैं, जिन्होंने अपने शौर्य, कौशल और साहस से अलग पहचान बनाई है।
इस कड़ी में भारत में एक राजा ऐसे भी हुए हैं, जिन्हें कविराज भी कहा जाता था। यह राजा कोई और नहीं, बल्कि गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त थे, जिन्हें उनकी आसाधरण साहित्यिक प्रतिभा और कला को लेकर उनके प्रेम की वजह से उन्हें कविराज कहा जाता था। क्या है इसके पीछे की कहानी, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
किस राजा को कहा जाता था कविराज
गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त को कविराज यानि कि कवियों का राजा भी कहा जाता था। इस संबंध में हमें उनके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की योग्यताओं के बारे में वर्णन किया गया है।
क्यों कहा जाता था कविराज
समुद्रगुप्त को कविराज कहने के पीछे अलग-अलग कारण थे, जो कि इस प्रकार हैंः
संगीत और वीणा वादन की प्रतिभा के धनी
समुद्रगुप्त संगीत और वीणा वादन की प्रतिभा के धनी थे। इसके प्रमाण हमें गुप्त काल के कुछ सोने के सिक्कों पर भी देखने को मिलते हैं, जिन पर समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्हें संगीत का ज्ञान था।
नारद और तुम्बरु से की गई है तुलना
प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की संगीत की तुलना देव-संगीतज्ञों से भी की गई है। इसमें उनकी तुलना नारद और तुम्बरु से कर जिक्र किया गया है।
बौद्धिक क्षमता के लिए प्रसिद्ध
समुद्रगुप्त को उनकी कई प्रमुख रचनाओं के लिए जाना जाता है। उन्होंने कई काव्य ग्रंथों की रचना की थी। वह बहुत ही कम समय में पद्य लिख देते थे, जिस वजह से उन्हें कविराज जैसी उपाधि दी गई।
कवियों को दिया आश्रय
समुद्रगुप्त ने राजा के रूप में अपने दरबार में कई विद्वानों और कवियों को आश्रय दिया। प्रसिद्ध कवि रहे हरिषेण उनके दरबारी कवि थे। उन्होंने यह सुनिश्चित किया था कि उनके दरबार में कला और साहित्य को जीवंत रखा जा सके। ऐसे में उन्होंने विद्वानों को संरक्षण दिया।
शास्त्र और शस्त्र में निपुण
प्रयाग प्रशस्ति के मुताबिक, ,समुद्रगुप्त को शास्त्र और शस्त्र में निपुण बताया गया है। वह ऐसे राजा थे, जो कि युद्ध के मैदान में भी अजेय रहते थे और दरबार में कला,संगीत और साहित्य के प्रति भी सजग थे। यही वजह है कि उन्हें इतिहास में भारत के नेपोलियन के साथ-साथ कविराज भी कहा जाता है।
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