गौतम बुद्ध की चार संगीतियां और इनसे जुड़े महत्त्वपूर्ण स्थान, देखें लिस्ट

Last Updated: Jun 10, 2026, 18:35 IST

यदि आप गौतम बुद्ध के बारे में पढ़ रहे हैं, तो आपको बुद्ध की चार संगीतियों के बारे में भी पता होना चाहिए। इस लेख में इस विषय पर विस्तार से जानेंगे।

गौतम बुद्ध
गौतम बुद्ध

यदि आप किसी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए बहुत उपयोगी है। क्योंकि, सरकारी परीक्षाओं में अक्सर बुद्ध को लेकर सवाल पूछे जाते हैं। ऐसे में परीक्षाओं में बौद्ध संगीतियों के बारे में भी पूछा जाता है। यहां 'संगीति' का अर्थ एक साथ बैठकर पाठ करना या चर्चा करना होता है। इस लेख में हम बौद्ध की चार संगीतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

प्रथम बौद्ध संगीति

पहली बौद्ध संगीति 483 ईसा पूर्व में महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद हुई थी। इसका आयोजन बिहार की राजगीर की सप्तपर्णी गुफा में किया गया था। आपको बता दें कि इस संगीति का आयोजन मगध सम्राट रहे अजातशत्रु के कार्यकाल में किया गया था। संगीति के अध्यक्ष महाकश्यप थे। इस संगीति में सुत्त पिटक के माध्यम से बुद्ध के धार्मिक उपदेशों को संकलित किया गया था। वहीं, विनय पटक में बौद्ध संघ के नियमों को संकलित किया गया था।

दूसरी बौद्ध संगीति

दूसरी बौद्ध संगीति का आयोजन 383 ईसा पूर्व में हुआ था। यह पहली संगीति के 100 साल बाद हुई थी, जिसका आयोजन बिहार के वैशाली में हुआ था। उस समय कालाशोक का शासन हुआ करता था। वहीं, संगीति के अध्यक्ष साबाकामी थे। इस संगीति में संघ के भिक्षुओं के बीच अनुशासन और नियमों को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया था। यही वह संगीति थी, जिसमें बौद्ध संघ पहली बार दो भागों में विभाजित हो गया था। इसमें पहला भाग स्थविर था, जो कि पुराने नियमों को मानने वाला था, जबकि दूसरा महासंधिक था, जो कि नियमों में बदलाव चाहता था।

तीसरी बौद्ध संगीति

तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन 250 ईसा पूर्व में बिहार के पाटलीपुत्र में हुआ था। यह मौर्य वंश के शासक अशोक के कार्यकाल में आयोजित की गई थी। संगीति के अध्यक्ष मोग्गलिपुत्त तिस्स थे। उस समय इसका आयोजन संघ की बुराइयों को दूर करने के लिए किया गया था, जिसमें तीसरा पिटक अभिधम्म पिटक को जोड़ा गया था। इसमें बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों के बारे में बताया गया था। 

चौथी बौद्ध संगीति 

चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन 72 ईस्वी में किया गया था। इसका आयोजन कश्मीर के कुंडलवन में कुषाण वंश के शासक कनिष्क के कार्यकाल के संरक्षण में हुआ था। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र और उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। संगीति में बौद्ध धर्म दो संप्रदायों में बंट गया था, जिसमें एक हीनयान था, जो कि बुद्ध को एक महापुरुष मानते थे और पुरानी परंपराओं पर अड़े गए थे। वहीं, दूसरा संप्रदाय महायान था, जो कि बुद्ध को भगवान मानकर उनकी मूर्ति पूजा करने लगे थे। कनिष्क भी महायान की तरफ था। इसी संगीति के बाद बौद्ध ग्रंथों के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग बहुत अधिक होने लगा था।


Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jun 10, 2026, 18:33 IST

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