‘महाभारत’ का सबसे पुराना नाम क्या है? नहीं पता होगा नाम, यहां जानें
हम सभी में से बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने महाभारत पढ़ी नहीं है, बल्कि इसे देखा जरूर होगा। धारावाहिक के रूप में महाभारत का कई निर्माताओं द्वारा निर्माण किया गया है। हालांकि, इसका सबसे प्राचीन नाम महाभारत नहीं है। इस लेख में हम इसके सबसे पुराने नाम और इसके इतिहास के बारे में जानेंगे।
आप सभी में बहुत-से लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने महाकाव्य यानि कि ‘महाभारत’ को पढ़ा नहीं होगा, लेकिन टीवी पर देखा जरूर होगा। फिर बात चाहे बी. आर. चोपड़ा के महाभारत धारावाहिक की हो या फिर अन्य निर्माताओं की, जिन्होंने नए कलाकारों के साथ महाभारत को टीवी धारावाहिक के रूप में घर-घर तक पहुंचाने का काम किया है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि महाभारत का सबसे पुराना और मूल नाम 'जय संहिता' है। इस लेख हमें इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
तीन चरणों में हुआ महाभारत का निर्माण
महाकाव्य महाभारत का निर्माण तीन चरणों में हुआ है। इस दौरान इसमें श्लकों की संख्या बढ़ती गई और अंत में लाखों में पहुंच गई। समय-समय पर इसमें विद्वानों ने श्लकों की संख्या बढ़ाने का काम किया।
महाभारत का सबसे प्रारंभिक रूप
महाभारत का सबसे प्रारंभिक रूप ‘जय’ है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई थी और शुरुआत में इसमें सिर्फ 8,800 श्लोक ही थे। इन श्लोकों में कौरवों और पांडवों के युद्ध और धर्म और अधर्म का वर्णन किया गया है।
‘भारत’ नाम से जाना गया ‘जय’
महर्षि वेदव्यास के शिष्य रहे वैशम्पायन द्वारा राजा जनमेजय के नाग यज्ञ में इस कथा को सुनाया गया था। उस समय इसमें श्लकों की संख्या बढ़कर 24,000 तक पहुंच गई थी। वहीं, कथा में भारत वंश के राजाओं का वर्णन किया गया था, जिससे इसका नाम ‘भारत’ पड़ गया।
ऐसी बनी महाभारत
महाकाव्य महाभारत का निर्माण ऋषि उग्रश्रवा सौती के समय हुआ। उन्होंने नैमिषारण्य में ऋषियों की एक सभा में इस कथा को सुनाया और इस दौरान कई कहानियां जुड़ गईं, जिससे श्लोकों की संख्या बढ़कर 1,00,000 को पार कर गई। ऐसे में श्लोकों की संख्या अधिक होने की वजह से इसे ‘सतसाहस्त्री संहिता’ या फिर ‘महाभारत’ कहा जाने लगा।
इसमें महाभारत अधिक प्रचलित हुआ और आज लोग इस महाकाव्य को महाभारत नाम से जानते हैं। आपको बता दें कि महाभारत के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति यह भी है कि जो महाभारत में नहीं है, वह दुनिया में कहीं भी नहीं है। इस महाकाव्य को पांचवा वेद भी कहा जाता है।
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