उत्तर प्रदेश का वह जिला, जहां नहीं मनाई जाती है दिवाली
दिवाली का पर्व पूरे उत्तर प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि, यह कुछ ऐसी जगह हैं, जहां दिवाली का पर्व नहीं मनाया जाता है, बल्कि इस दिन शोक प्रकट किया जाता है। इस लेख में हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
भारत में दिवाली का पर्व बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन पूरा देश रोशनी से नहाता है और बात जब उत्तर प्रदेश की हो, तो इस पर्व की छटां और बढ़ जाती है। यूपी में दिवाली का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि, यह स्थिति हर जिले की नहीं है, क्योंकि यहां कुछ ऐसी जगह भी हैं, जहां दिवाली पर खुशी और उत्साह नहीं, बल्कि शोक देखने को मिलता है। कौन-सी हैं ये जगह, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
यूपी में कहां नहीं मनाई जाती दिवाली
उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से दो संदर्भों में दीपावली न मनाने या इसे शोक के रूप में देखने की अनूठी परंपरा मिलती है। पहला, गौतम बुद्ध नगर के बिसरख में जहां रावण के जन्मस्थान के कारण उत्सव नहीं मनाया जाता, और दूसरा, लखीमपुर खीरी व बलरामपुर जैसे तराई के जिले जहां थारू जनजाति दीपावली को उत्सव के बजाय 'शोक पर्व' के रूप में मनाती है।
गौतमबुद्ध नगर जिले में क्यों नहीं मनाते दिवाली
गौतम बुद्ध नगर जिले के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्थित बिसरख गांव का नामकरण रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम पर हुआ था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था और उसने यहीं पर अपने पिता द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा व तपस्या की थी। गांव के लोग रावण को अपना 'बेटा' और पूर्वज मानते हैं।
मान्यताओं के मुताबिक, जब भगवान राम ने लंका में रावण का वध किया और अयोध्या लौटे, तब पूरा देश खुशियां मना रहा था, लेकिन बिसरख गांव में अपने ही वंशज के मारे जाने का गहरा दुख था। इसी कारण यहां के लोग न तो दशहरे पर रावण का पुतला जलाते हैं और न ही दीपावली पर आतिशबाजी या पारंपरिक उत्सव मनाते हैं।
लखीमपुर खीरी और बलरामपुर में 'शोक पर्व'
थारू जनजाति मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों-लखीमपुर खीरी, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती और महाराजगंज जिलों में रहती हैं। थारू समाज में दीपावली को पारंपरिक खुशियों के रूप में नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की याद और शांति के दिन के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन वे अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'भेंट' या 'बरसी' कहा जाता है। परिवार के लोग इकट्ठा होकर पूर्वजों के पसंदीदा भोजन तैयार करते हैं, मिट्टी के बर्तनों में जल व भोजन अर्पित करते हैं और शोक प्रकट करते हैं।
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